जनदर्पण

देश की दशा व दिशा में सुधार की उम्मीद से प्रतिबिम्बित ।

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sumandubey


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कब जागेगी हम भारतियों की गैरत

Posted On: 4 Oct, 2012  
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कैसे कहूं मैं ———————– मै राजभाषा हिन्दी हूं,

Posted On: 13 Sep, 2012  
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उठ जागो, देशावासियों उठ जागो,

Posted On: 15 Aug, 2012  
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नमस्कार, राख़ी की हार्दिक बधाईयाँ ।

Posted On: 31 Jul, 2012  
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बजी रणभेरी छिड़ा चुनावी समर,

Posted On: 8 Feb, 2012  
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10 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

सुमन जी           सादर प्रणाम, देरी से प्रतिक्रया के लिये क्षमा चाहूँगा. बहुत ही जोशीला और गैरत जगाने वाला आलेख. इंसान को जीवन में गैरतदार होना चाहिए बेगैरत का भी क्या जीना. मगर अपने गलत कारनामे छिपाने, अनटर्न्ड प्रमोशन जैसे लालच के कारण व्यक्ति अपनी गैरत को ताक पर रख कर ऐसे कृत्य करता है. हिंदी मात्रभाषा  का राजभाषा ना बन पाना अवश्य ही दुखद है और इसके लिए मुख्य रूप से जवाहरलाल नेहरू जिम्मेदार हैं. जिन्होंने दक्षिण भारतीय प्रदेशों कि मांग पर ऐसा आदेश जारी किया जो आजतक हिंदी को उसके सही पद को पाने में बाधक बना है. अच्छे आलेख पर बधाई स्वीकारें.               बहन जी लगता है नए जगह शिफ्ट होने से आपकी व्यस्तता बढ़ गयी है तभी महीने भर में एक ही आलेख लिखा है और मंच पर भी आपकी उपस्थिति देखने  में नहीं आ रही है. आपकी कुशलता के लिए शुभकामनाएं.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: sumandubey sumandubey

सुमन जी, सौ फ़ीसदी सत्य लिखा है आपने, आज प्रत्येक व्यक्ति को परिवार के भीतर ही गलत शिक्षाएं दी जा रही हैं, समाज और राष्ट्र के भले से पहले खुद का भला करने की सोंच विकसित की जा रही है, ऐसे में सही और गलत सोंचने की ज़रुरत किसी को महसूस ही नहीं होती, जब ऐसे परिवेश में पले बच्चे अपने ही माता-पिता के साथ अभद्रता और स्वार्थ का व्यवहार अपनाने लगते हैं, तब माता-पिता पछताते हैं, किन्तु तब तक देर हो चुकी होती है! व्यक्ति को इस बात को जल्द से जल्द समझ जाना चाहिए की जब सब स्वार्थी ही हो जायेंगे तो एक-दुसरे की पीठ में छुरा भोंकने में किसी को कोई शर्म नहीं आएगी और इस तरह हम एक अविश्वासी समाज में डर-डर के रहेंगे, जहां सबका व्यवहार पशुओं से भी बदतर हो जाएगा! ज़रुरत है नैतिकता की शिक्षा को अपने आचरण में लाने की सिर्फ कोरा कागज़ी ज्ञान समाज नहीं बदल सकता! इसके लिए प्रत्येक अभिभावक को ज़िम्मेदारी निभानी होगी!

के द्वारा: Anil "Pandit Sameer Khan" Anil "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: sumandubey sumandubey

के द्वारा: sumandubey sumandubey

के द्वारा: sumandubey sumandubey

के द्वारा: sumandubey sumandubey

टीम अन्ना व रामदेव का विरोध "देश के संविधान, लोकतंत्र और सांसदों का अपमान नही सहेंगे" " कश्मीर को देश से तोड़ने की वकालत करने वाले ये कैसे देशभक्त हैं ? टीम अन्ना व रामदेव की गिरफ़्तारी की मांग को लेकर "आज़ाद मजदूर किसान पार्टी" का आन्दोलन "भ्रष्टाचार-कालाधन बातें हैं बहकाने की साजिश है लोकतंत्र को मिटाने की" देश की सर्वोच्च संस्था संसद लोकतंत्र का मंदिर जिस तरह रास्ते के पत्थर को जब उठाकर मन्दिर में रख दिया जाता है, तो वो आस्था का विषय हो जाता है और उसे फिर भी कोई रास्ते के पत्थर की तरह अपमानित करे तो ये लोगों की आस्था पर चोट पहुँचाना होता है. ठीक उसी प्रकार अगर किसी दागी व्यक्ति को जब जनता ने ही अपना जनप्रतिनिधी चुनकर देश की सर्वोच्च संस्था संसद में भेज दिया है, तो किसी का कोई हक़ नही बनता की जनता की भावनाओं को ठेस पहुंचाए. और आखिर होते कौन हैं ये टीम अन्ना और रामदेव ?

के द्वारा:

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

सुमन जी सादर नमस्कार, हमारी कानूनी खामियों की वजह से आज राजनीति में सारे ही गुंडे आ बैठे हैं. आज की राजनीति बिना गुंडागर्दी के चल ही नहीं सकती. कल भी राजनेता इन गुंडों का सहारा लेते थे किन्तु अब वे गुंडे इन लोगों को अलग कर स्वयं ही नेता बन बैठे हैं. अब इनको हटाना आसान भी नहीं क्योंकि अब क़ानून भी इन्ही को बनाना है. जनता के लिए मुश्किल ये है की चार चोरों में से एक को चुनना है फिर मतदाता के विवेक का अर्थ ही क्या है? बेचारा जिसको भी अपने लाभ का चोर समझता है चुन लेता है.जहां सारे ही रंगदार हों वहां प्रलोभन के लिए कालेधन का खुलकर उपयोग होना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता. आवश्यकता तो कानूनी सुधार की है जो इस तरह के लोगों को चुनावी प्रक्रिया से ही दूर कर दे. आभार.

के द्वारा: akraktale akraktale

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आदरणीय सुमन दुबे जी ..... सादर अभिवादन ! यह जातिवाद का जहर नेताओं के लिए संजीवनी का काम करता है और इस्सकी फसल को काटकर ही तो ना जाने कितने ही नेता महान बने है इसलिए यह सब फिलहाल तो चलता ही रहेगा फिर सरकार चाहे किसी की भी क्यों ना हो देश में और प्रदेश में (contest ) किरपा करके चैक कर लीजियेगा की हिंदी में लिखना है या फिर अंग्रेजी में भी चल सकता है शुभकामनाओं सहित वंदे मातरम हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा सरस्वती माता जी के पूजन की हार्दिक मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय सुमन दुबे बहिन जी ...... सादर अभिवादन ! आपकी शुभकामनाये मिली अच्छा लगा लेकिन मैं यह भी महसूस कर रहा हूँ की आपको अपने पिछले ब्लॉग पर प्राप्त प्रतिकिर्याओ का उत्तर भी जरूर देना ही चाहिए क्योंकि परस्पर सम्वाद और आपसी विश्वाश के लिए यह बेहद जरूरी है वंदे मातरम सरस्वती माता जी के पूजन की हार्दिक मुबारकबाद हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

सुमन जी, किसी भी साहित्यिक रचना का सबसे बड़ा रस उसके भाव होते हैं। हाँ, कुछ व्याकरणीय नियम भी होते हैं जिनका अगर पालन कर लिया जाए तो खान से निकला हीरा एक तराशे हुए ख़ूबसूरत नग में बदल जाता है। मैं भी एक अदना सा ही इंसान और रचनाकार हूँ ( शायद नहीं भी हूँ ) पर अपनी छोटी सी ज़िंदगी में अर्जित ज्ञान और अनुभव के आधार पर सच कहने की कोशिश करता हूँ। प्रोत्साहन देना अच्छा होता है मगर झूठा प्रोत्साहन उतना ही ख़तरनाक भी हो सकता है। किसी भी प्रकार के सुझाव, सलाह अथवा प्रश्नों के लिए कृपया मेरे ई-मेल - sdwivedi16@rediffmail.com पर मुझसे संपर्क करें। अपनी छोटी बहन को एक बेहतर रूप में आगे ले जाने में मुझे बेहद ख़ुशी होगी। :)

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

के द्वारा:

वाहिद जी नमस्कार , बड़े दिन बाद आपने ब्लॉग पर दर्शन दिए है आपने सच कहा पर प्रतिबन्ध तो नहीं लगाया जा सकता ( न ही यह उचित होगा) भाई पर विचार अवश्य करना चहिये किसी के प्राण को हम अपने आहार के रूप में ले खुश तब हो सकते है जब तक उसकी पीड़ा के बारे में न विचार करे उस मौत के खौफ का एहसास न करे छोड़ा नही तो कम तो किया जा सकता है उनके हित को सोच कर वाहिद भाई हम इंसान धर्म की आड़ लेते क्या कोई भी धर्म बेमानी लूट बलात्कार चोरी शराब की शिच्छा देता है पर हम इंसान सब करते है ऐसा क्यों है और जिससे किसी की जान बच जाय तो वहा धर्म को ढाल बनाते है इद्दुल जुहा में तो साल में एक बार कुर्बानी होती है पर देवी मंदिरों में मनोती के नाम पर हमेशा ही निरीह जानवरों की बली दे जाती है इन सभी पर विचार की आवश्यकता है जंगल में तोथीक है ज्जीव जीव को खाए क्योकि वह सब जानवर है पर यहाँ तो हम इंसान कहलाते है खुद को सबसे बुद्धिमान तो विचार क्यों न करे इस तर्क पर की कसी की सांस छीन मार कर हम आहार स्वरूप क्यों ले स्वेच्छा से मजबूरी में तो बात अलग है .साभार.

के द्वारा: sumandubey sumandubey

अशोक जी नमस्कार, समाज व् धर्म मानव की आश्यकता है मैंने सभी धर्मो की बात की है आज हम विकास की उचाई छू रहे है अपने विचारों में भी आधुनिकता को स्थान देना समय के साथ आवश्यक है भाई सभी धर्मो में मासाहार है इसलिए मैंने सभी को इंगित किया पर आपका यह तर्क उचित नहीं की अन्न व् सब्जी के अभाव के नाते लोग मासाहार करते है जहा मजबूरी है वहा तो ठीक है पर स्वेच्छा से इंसान होने के नाते निरीह पशुओ को हत्या व् खाने से न तो हमारी आयु बढ़ती है न ही स्वास्थ हां किसी की जान जरूर जाती है मै तो एक पहल करने के लिए इंसानी नजरिये से सोचने की बात कह रही थी और वह सभी धर्मो के लिए क्यों की मासाहार व् बलिप्रथा में अगर बदलाव हो सकता है तो सिर्फ इंसानी गुणों से युक्त होकर सोचने से ही हो सकता है . धर्म व् जाती के नजर से नही क्योकि धर्म तो सारे प्रेम व् ईमान की शिछा देते है पर हम इंसान क्या कर रहे है देख ही रहे है पेपर के सारे पन्ने लूट ह्त्या बलात्कार भ्रष्टाचार की खबरों से भरे रहते है मेरी अपनी सोच है जो बात आपको अपने लिए न पसंद हो दूसरो के लिए न अपनाए और वाहिद भाई की बात यह भी सही है की सब मासाहार न करे यह राय भी ठीक नहीं पर मेरा यह निवेदन है आप भाइयो से एक बार विचार करे उस दर्द को देखे उस चीख को सुने उस खौफ को जो मौत के सामने होने पर होती तो सभी खाने वाले मेरे भाई कम जरूर कर पायेगे छोड़ भले न पाए क्योकि जो प्रिय है वह एकदम से छोड़ना बड़ा कठिन है गुटखे को ले लीजिये जान पर बनती है तब जाकर कही छोड़ता है लेकिन देर हो जाने पर फाड़ा कुछ नहीं होता और यहाँ तो कोई जान गवाता है तो हमे बस स्वाद मिलता है .आपने विचार रखे सादर साभार आपका .

के द्वारा: sumandubey sumandubey

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अशोक जी, आपकी जिज्ञाषा को संतुष्ट करने का प्रयास मात्र कर रहा हूँ,-- भगवान शंकर और माँ पार्वती का पति-पत्नी का प्रेम जन्म-जन्मान्तर का है, ऐसा हम सभी धार्मिक ग्रंथों में पढ़ते आ रहे हैं. पत्नियाँ उसी महादेव और माँ पार्वती को आदर्श मानकर दोनों की पूजा विभिन्न अवसरों पर करती हैं, चाहे वह करवा चौथ हो, हरितालिका तीज हो, या फिर शिवरात्रि व्रत. इसी सन्दर्भ में लोक भाषाओँ में गाया जानेवाला गीत जिसका भावार्थ इस प्रकार है -- पुरईन (यानी कमल के पत्ते) पर गौरा देई (यानी पार्वती देवी, सती भस्म होने के बाद पार्वती के रूप में हिमालय के यहाँ मैना की कोख से जन्म लेती हैं), सोते हुए एक स्वप्न देखती हैं, जिसमे हाथ में पोथी(यानी पुस्तक) लिए हुए ब्रह्मन बाबा ( यानी नारद जी ) आते है और स्वप्न में ही पार्वती देवी को उपदेश देते हैं कि उनके जन्म जन्मान्तर के पति तो साक्षात् शंकर भगवान् हैं, पर उन्हें पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या करनी पड़ेगी! पार्वती जी, स्वप्न की बात को सच मानकर तपस्या करने निकल पड़ती हैं. मैं समझता हूँ कि आपकी जिज्ञाषा को संतुष्ट कर पाया हूँ.- साभार जवाहर.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Dr.KAILASH DWIVEDI Dr.KAILASH DWIVEDI

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

आदरणीय सुमन दुबे जी .... सादर अभिवादन ! अपने लिए तो हर कोई है मांगता लेकिन सबके भले के लिए कोई -२ ही है मांगता आपकी कामना फलीभूत होकर सबके साथ मेरा भी कुछ भला हो जाए इसी कामना के साथ ... जय माता दी !!! ******************************************************************************** adrniy suman bahin ji ..... सादर अभिवादन ! सीमा पर आतंक छाया है, दुश्मन बारुद बिछाते है। हम समझौता समझौता रट, वीरों की जान गँवाते हैं। आजादी के बाद से ही इस तरह की नीति का पाल होता चला आ रहा है ..... चीन तो चीन हद तो तब हो जाति है की जब बंगलादेश राइफल्स द्वारा हमारे पांच जवानो की बेरहमी से हत्या कर दी जाति है तो तब भी हम बड़े भईया की शांतिप्रिय और क्षमाशील और सहनशील वाली छवि प्रदर्शित करते है ..... इसलिए कुछ भी आस बेमानी है ..... इस सुन्दर रचना पर मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o

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के द्वारा: sumandubey sumandubey

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जड़ों से भला कोई दूर होता है, हमतो तुम्हारी टहनी व शाखाएं, दें आशीष हमें हरा-भरा होने का। जिस धरा में जन्मे थे आप, उसकी रक्षा,सहेजने संजोने का। पितरों को समर्पित बहुत सुन्दर रचना के लिए साधुवाद ! कुछ पंक्तियाँ पेश हैं - आपने ताज देखा है? यदि हाँ! तो, उसके संगमरमरी बदन को भी देखा होगा फिर उसके कंगूरे व् गुम्बद को भी देखा होगा और, अनायास ही मुंह से निकला होगा- - वाह, ताज..! परन्तु क्या कभी सोंचा है,उस ईंट के विषय में - जो मिट्टी के अन्दर दबी है, और जिस पर टिकी है - यह संगमरमरी इमारत, यह प्रेम की इबारत, यह कंगूरे,और यह गुम्बद | उस ईंट में प्रदर्शन की भावना नही उसे सुन्दरता की अपेक्षा नहीं उसे लोगों की वाह !, की आवश्यकता नहीं- क्योंकि वह नींव की ईंट है, जिस पर टिका है उसकी तपस्या का- विकास रूपी प्रतिफल || — आप कभी वृक्ष के विकास को, उसके तने से नहीं,बल्कि जड़ों से आंकना ; – आप कभी ‘ ताज ‘ की सुन्दरता को, उस दबी हुयी ईंट से देखना ; – आप कभी अपनी सफलता को, माता-पिता और गुरु के- त्याग,परिश्रम और आशीर्वाद से जोड़ना : तब……… समझ आयेगी - उन जड़ों की विराटता, उस ईंट की सार्थकता, और माता-पिता,गुरु की भावना, और समझ आयेगा कि- इस विराटता, इस सुन्दरता, इस विकास के लिए, मिलने वाली ‘ वाह ! ‘ का असली हक़दार कौन है ??????

के द्वारा: naturecure naturecure

के द्वारा: sumandubey sumandubey




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