जनदर्पण

देश की दशा व दिशा में सुधार की उम्मीद से प्रतिबिम्बित ।

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अधिकार चाहतें हैं सभी, दायित्वों से मुँह मोड़ कर

Posted On: 3 Aug, 2012 Others में

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अधिकार चाहतें हैं, सभी

दायित्वों  से, मुँह  मोड़ कर

उसने देना सीखा ही नही,

बस मांगना  छोड़कर

बस मे हो, उसके अगर

अपनी रौशनी के लिये

औरों की झोंपड़ियॉ फूंक दे

अपना आशियां छोड़कर

तड़प रही थी एक जिन्दगी

तमाशयी बन थे, सब खडे

टूट गयी साँसे उसकी

बेदर्द  जहाँ को छोडकर

अर्थ के इस दौर में

संवेदनाएं सारी मिट गयी

खुश हो रहा आदमी

दूजे को रोता देख कर

रोज कोई न कोई दुशासन,

चीर हरता द्रौपदी का

पुकारने पर द्रौपदियों के

कृष्ण कोई आते नही हैं

अपनी द्धारिका को  छोड़कर।



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
August 8, 2012

आदरणीय सुमन दीदी, सादर ! सम्पूर्ण समाज का दर्द समेटे आपकी यह कविता आपकी सहृदयता और संवेदनशीलता को प्रकट कर रही है ! सादर नमन !

Rajesh Dubey के द्वारा
August 7, 2012

अधिकार पाने के लिए दायित्व का निर्वहन करना पड़ेगा. संवेदनाएं मर रही हैं किसी के दुःख को देख कर लोग भागना चाहते हैं. समाज को प्रतिबिंबित करती अच्छी कविता.

seemakanwal के द्वारा
August 6, 2012

सुमनजी सुन्दर रचना .आज के लोगों की मानसिकता का परिचायक कविता में ढले भाव .

dineshaastik के द्वारा
August 5, 2012

आदरणीय सुमन जी, बहुत ही सुन्दर सामाजिक पतन को इंगित करती सराहनीय काव्यात्मक के लिये बधाई……

jlsingh के द्वारा
August 4, 2012

आदरणीय सुमन जी, नमस्कार! काफी दिनों बाद आपको अशोक जी के ब्लॉग पर देखा ….. आज आप आ गयी, अपनी वाटिका छोड़कर? आपकी स्वस्थ रचना पढ़कर खुशी हुई!

akraktale के द्वारा
August 3, 2012

सुमन जी सादर, रोज कोई न कोई दुशासन, चीर हरता द्रौपदी का पुकारने पर द्रौपदियों के कृष्ण कोई आते नही हैं अपनी द्धारिका को छोड़कर। बहुत सुन्दर रचना, आज की हकीकत को बयान करने में पूरी तरह सफल. बधाई.

manoranjanthakur के द्वारा
August 3, 2012

अधिकार जाताना तो सब हमभी चाह ते है सुंदर रचना


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