जनदर्पण

देश की दशा व दिशा में सुधार की उम्मीद से प्रतिबिम्बित ।

48 Posts

608 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 6156 postid : 364

कब जागेगी हम भारतियों की गैरत

Posted On: 4 Oct, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

एक अक्टूबर को दैनिक जागरण में (यथार्थ कोना) में पेज नम्बर- नौ में भाई नदीम जी का लेख तलाश गैरत की – समाज की कुछ ऐसे सच्चाई बयां करता है, जिसे कोई भी झुंठ्ला नही सकता। बडे अधिकारियों का सिपाही से अपने जूते का फीता बंधवाना राजनीतिक मुखिया का सुरक्षा अधिकारी द्धारा रुमाल से जूता पोछंना । किसी मुख्यमंत्री जी के दरबार में धर्म गुरुओं का नंगे पांव उनसे मिलने जाना, जब कि वह खुद जूते सहित विराज मान थे , एक महिला आई एस अधिकारी का पौधा रोपण के दौरान मन्त्री जी को हाथ धुलवाने के बाद अपनी –अपनी रुमाल देने की प्रतिस्पर्धा में अन्य अधिकारियों से जीत जाना और खुश होना। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसकी ओर नदीम जी ध्यान आकर्षित करते हैं, जब –जब ऐसी घट्नायें घट्ती हैं। इस लेख में नदीम जी ने बताया की जनता की राय में जिन्होंने ये सब किया उन्हे अपनी गैरत जगाना चाहिये । लेकिन क्या ये सम्भव है । हमारे भीतर क्या जागेगी ये गैरत? आज सबसे अधिक नैतिक मूल्यों का और इसी गैरत का हम सबके भीतर नाश हुआ है। चाहे वह राजनीतिक स्तर पर हो, य समाजिक स्तर, परिवारिक स्तर पर, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हो सबसे अधिक ह्रास इसी का हुआ है। देश को आजाद हुये साठ साल हो गये। परन्तु राष्ट भाषा आज भी सरकारी कामकाज की भाषा नही बन पायी। माननीय न्यायलयों की भाषा नही बन पायी ।हम कहते हैं, अग्रेंजी के बिना हम विकास ही नही कर पायेगें। जब कि हमारा पड़ोसी चीन अपने भाषा के बल पर हमसे अधिक विकास कर रहा है। देश से बाहर क्या सम्मान दिलाने की बात करगें हमने देश के भीतर ऐसी नीतियां बनायी की आज भी हमारी राष्ट्भाषा अँगरेज़ी की दासी सी लगती है। हमारे अन्दर आज तक यह गैरत नही जाग पायी कि माननीय संसद से लेकर माननीय न्यायलय तक सरकारी द्फ्तरों से लेकर प्राइवेट संस्थानों में राजभाषा हिन्दी का वही स्थान होता जो आज अँगरेज़ी का है। अंग्रेजी जिसे जरुरत हो उसे जरुर उपलब्ध करायी जाये। परन्तु राष्ट हम भारतीयों के तथा हमारी राष्टभाषा के नसीब में शायद ही, कभी ऐसा दिन आये। अंग्रेजी आवश्यक है, क्यों कि वह ग्लोबल भाषा बन चुकी है, पर देश के स्तर पर राष्ट्भाषा को दासी बनाकर कदापि नही, लेकिन ये गैरत आज तक हमारे भीतर नही जाग पायी।

नेता नीति से विरक्त हो राजनीति करते हैं। आय से अधिक धन ,घोटाले पर घोटाले करते हैं। खुद को माननीय कहते हैं । परन्तु ससंद व विधान सभा के भीतर हांथा-पाई माइक तोडना, फेंकना वोट के बदले नोट आदि क्रियाकलाप करते हैं। यह सब करते हुये उनके भीतर की गैरत कभी नही जागती, कि उनके द्धारा किये गये इस किय्राकलाप का देश और देशवासियों तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर क्या असर होगा। इसी तरह अधिकारियों की गैरत कभी नही जागती जब विकास की योजनायें कुछ लोगों के मिली भगत से कागजी शेर साबित हो जाती हैं, और व्यवहार में कहीं कुछ भी नही होता। लेकिन उसके लिये आया हुआ धन बन्दर वांट हो जाता है । मनरेगा, स्वास्थ घोटाले व इसी तरह के अन्य घोटाले के माध्यम से देश के विकास का पैसा ड्कारते वक्त ये अपनी गैरत से मुँह मोड़ लेते हैं। सत्य तो यह है कि शिक्षक धर्म गुरु डाक्टर वकील, इन्जीनियर, किसी भी पेशे से जुडा इन्सान हो या वो आम आदमी हो कोई भी गैरत की तलाश में नही वरन सभी को अपने नीहित स्वार्थ हेतु येन केन प्रकारेण अपना काम निकालना है, चाहे व तरीका जायज हो नाजायज हो शिफारिश का हो या फिर अर्थ के माध्यम से हो उसके लिये गैरत जाये या रहे, आज धनवान व्यक्ति की समाज में बडी इज्जत है, वह धन उसने कैसे अर्जित किया यह कोई जानना नही चाहता।हम सब अपनी सन्तान से कहते हैं पढ लिख कर बडे आदमी बनो परन्तु यह नही कहते कि बेटा आप पहले एक अच्छे इन्सान बनिये। परिवार का मुखिया वेतन से अधिक परिवार पर खर्च करता है, तो परिवार वालों की गैरत ये नही पूछ्तीं कि वह धन कहां से लाया। ऊपर की आमदनी गैरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है । एक दिन हम अपने एक परिचित के साथ उनके परचित एक अफसर के यहां मिलने गये , तो उन्होने अपने बेटे से पैर छूने को कहा तो उसने नमस्ते किया तो अफसर महोदय ने कहा, कि आज कल के बच्चों को पैर छूने में काम्पलेक्स लगता है तो हमारे साथ जो सज्जन थे काफी वरिष्ठ थे उन्होने तपाक से कहा, जब तुम वेतन से अधिक रिश्वत एकत्रित करते हो तो तुम्हारे बेटे को काम्पलेक्स नही होता होगा क्यों ? आज़ ये समाज की सच्चाई है ये गैरत ईमानदारी देश के प्रति कर्त्वय अपने विभाग के लिये जिम्मेदारी का निर्वहन चन्द लोगों के पास सीमित रह गया है, और जिनके पास है वो उत्पीडित हो रहा है। लोग उसका माखौल उडाते हैं , सत्यमेव जयते शब्द एक दूसरे को उपदेश देने के लिये लोगों ने सँभाल कर रखा है। स्वंय के लिये उसकी आवश्यकता नही है। काश प्रत्येक स्तर पर हम अपने गैरत को जगा पायें आज हर भारतीय को इसकी महती आवश्यकता है, कि वह व्यक्तिगत स्तर से लेकर राष्टीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने भाषा संस्कारों मूल्यों से समझौता न करे और अपने स्वाभिमान ,गैरत को जगाये और बनाये रखकर देश और समाज के विकास मे अपना योगदान दे।



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

19 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
November 1, 2012

सुमन जी           सादर प्रणाम, देरी से प्रतिक्रया के लिये क्षमा चाहूँगा. बहुत ही जोशीला और गैरत जगाने वाला आलेख. इंसान को जीवन में गैरतदार होना चाहिए बेगैरत का भी क्या जीना. मगर अपने गलत कारनामे छिपाने, अनटर्न्ड प्रमोशन जैसे लालच के कारण व्यक्ति अपनी गैरत को ताक पर रख कर ऐसे कृत्य करता है. हिंदी मात्रभाषा  का राजभाषा ना बन पाना अवश्य ही दुखद है और इसके लिए मुख्य रूप से जवाहरलाल नेहरू जिम्मेदार हैं. जिन्होंने दक्षिण भारतीय प्रदेशों कि मांग पर ऐसा आदेश जारी किया जो आजतक हिंदी को उसके सही पद को पाने में बाधक बना है. अच्छे आलेख पर बधाई स्वीकारें.               बहन जी लगता है नए जगह शिफ्ट होने से आपकी व्यस्तता बढ़ गयी है तभी महीने भर में एक ही आलेख लिखा है और मंच पर भी आपकी उपस्थिति देखने  में नहीं आ रही है. आपकी कुशलता के लिए शुभकामनाएं.

sudhajaiswal के द्वारा
October 13, 2012

सुमन जी, जनता की जमीर ही सो चुकी है तो नेता क्यों न लुटेरे बनें, अच्छे लेख के लिए बहुत बधाई|

seemakanwal के द्वारा
October 10, 2012

आवश्यकता है, कि वह व्यक्तिगत स्तर से लेकर राष्टीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने भाषा संस्कारों मूल्यों से समझौता न करे और अपने स्वाभिमान ,गैरत को जगाये और बनाये रखकर देश और समाज के विकास मे अपना योगदान दे। सुमन जी आप से पूरी तरह सहमत .

nishamittal के द्वारा
October 10, 2012

सही सार्थक सन्देश अपने आत्मसम्मान की कद्र करे बिना कैसे सफल हो सकते हैं सुमन जी

chaatak के द्वारा
October 10, 2012

सुमन जी, सादर अभिवादन, इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीयों का विवेक आमतौर पर सोता रहता है इन्हें चेतना आती तो है लेकिन वक्त गुजरने के बाद, ये न पढ़ते हैं और न समझते हैं- ‘का बरसा जब कृषि सुखानी’ बाद में चिल्ल पों करने की इनकी पुरानी आदत है समय पर ये हाथ तो कया जुबान तक नहीं हिलाते हैं| जब इस देश की दशा देखता हूँ तो ईश्वर पर विश्वास करने का मन करता है क्योंकि जहाँ जनता सोती रहे और शासक लूट मचाता रहे वह देश तो या तो टूट कर बिखर जाना चाहिए या फिर किसी का गुलाम हो जाना चाहिए और ये दोनों नहीं हो रहा है इसका मतलब राम मालिक है! अच्छी पोस्ट पर बधाई!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 9, 2012

काश प्रत्येक स्तर पर हम अपने गैरत को जगा पायें आज हर भारतीय को इसकी महती आवश्यकता है, कि वह व्यक्तिगत स्तर से लेकर राष्टीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने भाषा संस्कारों मूल्यों से समझौता न करे और अपने स्वाभिमान ,गैरत को जगाये और बनाये रखकर देश और समाज के विकास मे अपना योगदान दे। सहमत, aadarniy dubey जी सादर.

yogi sarswat के द्वारा
October 8, 2012

मैंने भी पढ़ा था उस लेख को ! हमारी गैरत कभी जागी है जो अब जागेगी ? हम अपनी मर्दानगी दिखाते तो हैं , नाबालिग बच्चियों के साथ दुष्कर्म करके ! और हम कायर कौम के कायर लोग कर भी क्या सकते हैं इसके अलावा ?

    sumandubey के द्वारा
    October 9, 2012

    yogi ji nmskar, aap shi hai par vakt ki pukaar hai ki ham apni gairt jgaye rasht hit me svaarth ko knare kre.

sumandubey के द्वारा
October 7, 2012

नमस्कार .

Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
October 6, 2012

सुमन जी, सौ फ़ीसदी सत्य लिखा है आपने, आज प्रत्येक व्यक्ति को परिवार के भीतर ही गलत शिक्षाएं दी जा रही हैं, समाज और राष्ट्र के भले से पहले खुद का भला करने की सोंच विकसित की जा रही है, ऐसे में सही और गलत सोंचने की ज़रुरत किसी को महसूस ही नहीं होती, जब ऐसे परिवेश में पले बच्चे अपने ही माता-पिता के साथ अभद्रता और स्वार्थ का व्यवहार अपनाने लगते हैं, तब माता-पिता पछताते हैं, किन्तु तब तक देर हो चुकी होती है! व्यक्ति को इस बात को जल्द से जल्द समझ जाना चाहिए की जब सब स्वार्थी ही हो जायेंगे तो एक-दुसरे की पीठ में छुरा भोंकने में किसी को कोई शर्म नहीं आएगी और इस तरह हम एक अविश्वासी समाज में डर-डर के रहेंगे, जहां सबका व्यवहार पशुओं से भी बदतर हो जाएगा! ज़रुरत है नैतिकता की शिक्षा को अपने आचरण में लाने की सिर्फ कोरा कागज़ी ज्ञान समाज नहीं बदल सकता! इसके लिए प्रत्येक अभिभावक को ज़िम्मेदारी निभानी होगी!

    jlsingh के द्वारा
    October 7, 2012

    बिलकुल सही कहा आपने – इसके लिए प्रत्येक अभिभावक को ज़िम्मेदारी निभानी होगी!

    shashibhushan1959 के द्वारा
    October 7, 2012

    आदरणीय सुमन दीदी, सादर ! आदरणीय अनिल जी और जवाहर भाई की बातों से सम्पूर्ण सहमती ! नम्रता और कायरता में, घमंड और स्वाभिमान में, अहिंसा और दब्बूपन में अंतर होता है ! उस अंतर को समझना और समझाना चाहिए ! बहुत सार्थक और उपयोगी रचना ! हार्दिक बधाई !

    sumandubey के द्वारा
    October 7, 2012

    अनिल जी नमस्कार , धन्यवाद ब्लॉग पर आपका स्वागत है अपने सच कहा आज नैतिकता की बाते अमल में लाना जरूरी है आप भाई शशी और भाई जवाहर जी की बातो से मै भी सहमत हू , सबकी टिप्पणी कुछ लिखने में प्रोत्साहन का काम करती है .

vinitashukla के द्वारा
October 6, 2012

मूल्यों के पतन व समाज की बदलती हुई मानसिकता पर प्रकाश डालती हुई उत्तम पोस्ट. बधाई एवं साधुवाद.

    sumandubey के द्वारा
    October 7, 2012

    विनीता जी नमस्कार , मूल्य भी बदल गए है वक्त के साथ बुरे की भी महिमा का बखान होने लगा है वस वह धनी हो , धन्यवाद आप सबकी टिप्पणी कुछ लिखने में प्रोत्साहन का काम करती है . 

deepasingh के द्वारा
October 6, 2012

सुमन जी अच्छा लेख, ये सत्य है की आज हिंदी अपने हे देश में अंग्रेजी के समक्ष दासी ही बन गई है.लोगो की मानसिकता ये बन गई है की अगर वो हिंदी का प्रयोग करेंगे तो उनका व्यक्तित्व गिर जायेगा और इसी सोच रखना निंदनीय हे नही अपनी मात्र भाषा का निरादर करना भी है. शुभकामनाय और मेरे ब्लॉग पर भी अवश्य जाय्धन्येआद.

    sumandubey के द्वारा
    October 7, 2012

       दीपा , जी नमस्कार , ब्लाग पर आपका स्वागत है अवश्य आपके ब्लॉग तक पहुचने की कोशिश करुँगी धन्यवाद .

manoranjanthakur के द्वारा
October 4, 2012

सुमन जी बहुत दिनों बाद … बहुत सुंदर पोस्ट बधाई

    sumandubey के द्वारा
    October 7, 2012

    मनोरंजन जी नमस्कार , धन्यवाद आप सबकी टिप्पणी कुछ लिखने में प्रोत्साहन का काम करती है .


topic of the week



latest from jagran